आदिवासी समाज में गोत्र (किली) का महत्व

आदिवासी समाज में गोत्र (किली) का महत्व

उरांव, मुंडा, संथाल, हो और कई अन्य आदिवासी समुदायों में गोत्र (किली) व्यवस्था सामाजिक जीवन का आधार है। अधिकतर गोत्र किसी पशु, पक्षी, पेड़ या प्राकृतिक वस्तु के नाम पर होते हैं — जैसे एक्का (कछुआ), तिग्गा (एक प्रकार का बंदर), लकड़ा (बाघ), कुजूर (एक लता) आदि।

प्रकृति से रिश्ता

जिस गोत्र का जो प्रतीक होता है, उस गोत्र के लोग उसे नुकसान नहीं पहुँचाते और उसका सम्मान करते हैं। इस तरह गोत्र व्यवस्था प्रकृति संरक्षण से भी जुड़ी है।

विवाह में गोत्र

परंपरा के अनुसार एक ही गोत्र के लड़का-लड़की आपस में भाई-बहन माने जाते हैं, इसलिए कई समुदायों में एक ही गोत्र में विवाह नहीं किया जाता। इसीलिए आदिवासी विवाह पर आप "अपने गोत्र को छोड़ें" फ़िल्टर से खोज कर सकते हैं।

नोट: अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में नियम अलग हो सकते हैं, अपने गाँव-समाज के बड़ों से सलाह ज़रूर लें।